सनातन शिव धर्म

सनातन शिव हिंदू धर्म के संस्थापक सब से बडे भगवान देवों के देव महादेव हैं.

सनातन धर्म अपने मूल रूप हिंदु धर्म के वैकल्पिक नाम से जाना जाता है।

वैदिक काल में भारतीय उपमहाद्वीप के धर्म के लिये ‘सनातन धर्म’ नाम मिलता है।

‘सनातन’ का अर्थ है – शाश्वत या ‘हमेशा बना रहने वाला’, अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त, वह सिर्फ मूल तत्व सदा शिव ही हैं जिन्हें पाराब्रम्हा भी कहा जाता है ।

सनातन धर्म मूलत: भारतीय धर्म है, जो किसी ज़माने में पूरे वृहत्तर भारत (भारतीय उपमहाद्वीप) तक व्याप्त रहा है। विभिन्न कारणों से हुए भारी धर्मान्तरण के बाद भी विश्व के इस क्षेत्र की बहुसंख्यक आबादी इसी धर्म में आस्था रखती है।

शिललिंग द्वारा ही सभी आत्माओं का जन्म होता है,ओर उसी में लीन हो जाते हैं.

“ यह पथ सनातन है। समस्त देवता और मनुष्य इसी मार्ग से पैदा हुए हैं तथा प्रगति की है। हे मनुष्यों आप अपने उत्पन्न होने की आधाररूपा अपनी माता को विनष्ट न करें। ”
—ऋग्वेद-3-18-1

सनातन शिव धर्म जिसे हिन्दू धर्म अथवा वैदिक धर्म भी कहा जाता है और यह १९६०८५३११० साल का इतिहास हैं।

ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित अग्नि, आदित्य, वायु और अंगिरा ने इस धर्म की स्थापना की। क्रमश: कहे तो विष्णु से ब्रह्मा, ब्रह्मा से 11 रुद्र, 11 प्रजापतियों और स्वायंभुव मनु के माध्यम से इस धर्म की स्थापना हुई। इसके बाद इस धा‍र्मिक ज्ञान की शिव के सात शिष्यों से अलग-अलग शाखाओं का निर्माण हुआ। वेद और मनु सभी धर्मों का मूल है। मनु के बाद कई संदेशवाहक आते गए और इस ज्ञान को अपने-अपने तरीके से लोगों तक पहुंचाया।

लगभग 90 हजार से भी अधिक वर्षों की परंपरा से यह ज्ञान श्रीकृष्ण और गौतम बुद्ध तक पहुंचा।

यदि कोई पूछे- कौन है हिन्दू धर्म का संस्थापक तो कहना चाहिए परब्रह्मा शिव है प्रथम और श्रीकृष्ण हैं अंतिम। जो पूछते हैं उन्हें कहो कि…अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा ने हिंदू धर्म की स्थापना की। यह किसी पदार्थ नहीं ऋषियों के नाम हैं।

अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम।

दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृगयु : समलक्षणम्॥- मनु स्मृति

* जिस परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न कर अग्नि आदि चारों ऋषियों के द्वारा चारों वेद ब्रह्मा को प्राप्त कराए उस ब्रह्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा से ऋग, यजुः, साम और अथर्ववेद का ग्रहण किया।-मनु स्मृति

* आदि सृष्टि में अवान्तर प्रलय के पश्चात् ब्रह्मा के पुत्र स्वायम्भुव मनु ने धर्म का उपदेश दिया। मनु ने ब्रह्मा से शिक्षा पाकर भृगु, मरीचि आदि ऋषियों को वेद की शिक्षा दी। इस वाचिक परम्परा के वर्णन का पर्याप्‍त भाग मनुस्मृति में यथार्थरूप में मिलता है।

* शतपथ ब्राह्मण के अनुसार अग्नि, वायु एवं सूर्य ने तपस्या की और ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद को प्राप्त किया।

* प्राचीनकाल में ऋग्वेद ही था फिर ऋग्‍वेद के बाद यजुर्वेद व सामवेद की शुरुआत हुई। बहुत काल तक यह तीन वेद ही थे। इन्हें वेदत्रयी कहा जाने लगा। मान्यता अनुसार इन तीनों के ज्ञान का संकलन भगवान राम के जन्‍म के पूर्व पुरुरवा ऋषि के समय में हुआ था।

* अथर्ववेद के संबंध में मनुस्मृति के अनुसार- इसका ज्ञान सबसे पहले महर्षि अंगिरा को हुआ। बाद में अंगिरा द्वारा सुने गए अथर्ववेद का संकलन ऋषि अथर्वा द्वारा कि‍या गया। इस तरह हिन्दू धर्म ऋग्वेद को भी मानते थे और जो अथर्ववेद को मानते थे। इस तरह चार किताबों का अवतरण हुआ।

* कृष्ण के समय महर्षि पराशर के पुत्र कृष्ण द्वैपायन (वेदव्यास) ने वेद को चार प्रभागों में संपादित किया। इन चारों प्रभागों की शिक्षा चार शिष्यों पैल, वैशम्पायन, जैमिनी और सुमन्तु को दी। उस क्रम में ऋग्वेद- पैल को, यजुर्वेद- वैशम्पायन को, सामवेद- जैमिनि को तथा अथर्ववेद.

हमारे ऋषि-मुनियों ने ध्यान और मोक्ष की गहरी अवस्था में ब्रह्म, ब्रह्मांड और आत्मा के रहस्य को जानकर उसे स्पष्ट तौर पर व्यक्त किया था। वेदों में ही सर्वप्रथम ब्रह्म और ब्रह्मांड के रहस्य पर से पर्दा हटाकर कुंडलिनी जागरण कर के ‘ मोक्ष’ की धारणा को प्रतिपादित कर उसके महत्व को समझाया गया था। मोक्ष के बगैर आत्मा की कोई गति नहीं इसीलिए ऋषियों ने मोक्ष के मार्ग को ही सनातन शिव धर्म मार्ग माना है।

सभी सम्प्रदायों के समान ही शाक्त सम्प्रदाय का उद्देश्य भी मोक्ष है। फिर भी शक्ति का संचय करो, शक्ति की उपासना करो, शक्ति ही जीवन है, शक्ति ही धर्म है, शक्ति ही सत्य है, शक्ति ही सर्वत्र व्याप्त है और शक्ति की सभी को आवश्यकता है। बलवान बनो, वीर बनो, निर्भय बनो, स्वतंत्र बनो और शक्तिशाली बनो। इसीलिए नाथ और शाक्त सम्प्रदाय के साधक शक्तिमान बनने के लिए तरह-तरह के योग और साधना करते रहते हैं। सिद्धियाँ प्राप्त करते रहते हैं। शक्ति से ही मोक्ष पाया जा सकता है। शक्ति नहीं है तो सिद्ध, बुद्धि और समृद्धि का कोई मतलब नहीं है।

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